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कुमारसंभवम् • अध्याय 6 • श्लोक 58
जङ्गमं प्रैष्यभावे वः स्थावरं चरणाङ्कितम् । विभक्तानुग्रहं मन्ये द्विरूपमपि मे वपुः ॥
आपका चलायमान रूप और मेरे स्थिर रूप दोनों ही आपके अनुग्रह से युक्त हैं, ऐसा मैं मानता हूँ।
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