अपमेघोदयं वर्षमदृष्टकुसुमं फलम् । अतर्कितोपपन्नं वो दर्शनं प्रतिभाति मे ॥
आपका दर्शन ऐसा प्रतीत होता है जैसे बिना बादल के वर्षा या बिना फूल के फल का मिलना।
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