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कुमारसंभवम् • अध्याय 6 • श्लोक 2
तया व्याहृतसन्देशा सा बभौ निभृता प्रिये । चूतयष्टिरिवाभ्याष्ये मधौ परभृतामुखी ॥
सखी द्वारा संदेश कहे जाने पर वह प्रिय के समीप लज्जित होकर ऐसी शोभा देने लगी जैसे वसंत में कोयल से युक्त आम की डाल।
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