तं वीक्ष्य वेपथुमती सरसाङ्गयष्टिर्निक्षेपणाय पदमुद्धृतमुद्वहन्ती । मार्गाचलव्यतिकराकुलितेव सिन्धुः शैलाधिराजतनया न ययौ न तस्थौ ॥
उसे देखकर पार्वती काँप उठी और आगे बढ़ते हुए भी न आगे बढ़ सकी न रुक सकी, जैसे पर्वतों से बाधित नदी असमंजस में पड़ जाती है।
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