निवार्यतामालि किमप्ययं बटुः पुनर्विवक्षुः स्फुरितोत्तराधरः । न केवलं यो महतोऽपभाषते शृणोति तस्मादपि यः स पापभाक् ॥
हे सखि, इस ब्रह्मचारी को रोको, जो फिर कुछ कहने को उद्यत है; क्योंकि जो महात्माओं की निंदा करता है ही नहीं, बल्कि जो उसे सुनता भी है, वह भी पाप का भागी होता है।
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