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कुमारसंभवम् • अध्याय 5 • श्लोक 81
विवक्षता दोषमपि च्युतात्मना त्वयैकमीशं प्रति साधु भाषितम् । यमामनन्त्यात्मभुवोऽपि कारणं कथं स लक्ष्यप्रभवो भविष्यति ॥
तुमने दोष बताने के प्रयास में भी ईश्वर के विषय में उचित ही कहा है; जिसे स्वयं ब्रह्मा भी कारण मानते हैं, वह कैसे किसी सीमित लक्ष्य का विषय हो सकता है?
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