तदङ्गसंसर्गमवाप्य कल्पते ध्रुवं चिताभस्मरजो विशुद्धये । तथा हि नृत्याभिनयक्रियाच्युतं विलिप्यते मौलिभिरम्बरौकसाम् ॥
उसके अंगों के स्पर्श से चिताभस्म भी शुद्ध हो जाता है, जैसे देवता नृत्य के पश्चात अपने मस्तक पर धूल धारण करते हैं।
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