द्वयं गतं सम्मति शोचनीयतां समागमप्रार्थनया कपालिनः । कला च सा कान्तिमती कलावतस्त्वमस्य लोकस्य च नेत्रकौमुदी ॥
कपालधारी शिव से मिलन की इच्छा से ये दोनों ही शोचनीय हो गए हैं—वह चंद्रकला और तुम, जो इस संसार की नेत्रों की चाँदनी हो।
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