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कुमारसंभवम् • अध्याय 5 • श्लोक 67
त्वमेव तावत्परिचिन्तय स्वयं कदा चिदेते यदि योगमर्हतः । वधूदुकूले कलहंसलक्षणं गजाजिनं शोणितबिन्दुवर्षि च ॥
तुम स्वयं विचार करो कि क्या कभी यह संगत संभव है—एक ओर वधू के वस्त्र पर हंसचिह्न और दूसरी ओर रक्तबिंदुयुक्त गजचर्म।
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