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कुमारसंभवम् • अध्याय 5 • श्लोक 65
अथाह वर्णी विदितो महेश्वरस्तदर्थिनी त्वं पुनरेव वर्तसे । अमङ्गलाभ्यासरतिं विचिन्त्य तं तवानुवृत्तिं न च कर्तुमुत्सहे ॥
तब उस ब्रह्मचारी ने कहा—महेश्वर को मैं जानता हूँ, और तुम उसी की इच्छुक हो; परंतु उसके अमंगल आचरण को देखकर मैं तुम्हें उसका अनुसरण करने की सलाह नहीं दे सकता।
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