अथाग्रहस्ते मुकुलीकृताङ्गुलौ समर्पयन्ती स्फटिकाक्षमालिकाम् । कथं चिद्रेस्तनया मिताक्षरं चिरव्यवस्थापितवागभाषत ॥
तब पर्वतपुत्री ने संकोच से उँगलियाँ समेटकर स्फटिक की माला अर्पित करते हुए कठिनाई से थोड़े शब्दों में उत्तर दिया।
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