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कुमारसंभवम् • अध्याय 5 • श्लोक 62
अगूढसद्भावमितीङ्गितज्ञया निवेदितो नैष्ठिकसुन्दरस्तया । अयीदमेवं परिहास इत्युमामपृच्छदव्यञ्जितहर्षलक्षणः ॥
उसकी सखी ने उसके स्पष्ट भाव को समझकर प्रकट किया, तब वह ब्रह्मचारी सुंदर व्यक्ति प्रसन्नता छिपाते हुए उमा से बोला—क्या यह सब परिहास है?
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