यदा च तस्याधिगमे जगत्पतेरपश्यदन्यं न विधिं विचिन्वती । तदा सहास्माभिरनुज्ञया गुरोरियं प्रपन्ना तपसे तपोवनम् ॥
जब इसने शिव को प्राप्त करने के लिए अन्य कोई उपाय नहीं देखा, तब हमारी और गुरु की अनुमति से यह तप करने के लिए वन में चली आई।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
कुमारसंभवम् के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।
सभी अध्याय उपलब्ध
कुमारसंभवम् के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।