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कुमारसंभवम् • अध्याय 5 • श्लोक 58
यदा बुधैः सर्वगतस्त्वमुच्यसे न वेत्सि भावस्थमिमं जनं कथम् । इति स्वहस्ताल्लिखितश्च मुग्धया रहस्युपालभ्यत चन्द्रशेखरः ॥
जब यह सुनती है कि शिव सर्वव्यापी हैं, तो अपने हाथ से लिखकर भोलेपन से शिकायत करती है कि फिर वह इसे क्यों नहीं जानते।
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