त्रिभागशेषासु निशासु च क्षणग्निमील्य नेत्रे सहसा व्यबुध्यत । क्क नीलकण्ठ व्रजसीत्यलक्ष्यवागसत्यकण्ठार्पितबाहुबन्धना ॥
रात के अंतिम भाग में थोड़ी देर आँखें बंद कर अचानक जाग उठती है और कहती है—हे नीलकण्ठ, कहाँ जा रहे हो—और फिर व्यर्थ ही बाहु फैलाती है।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
कुमारसंभवम् के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।
सभी अध्याय उपलब्ध
कुमारसंभवम् के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।