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कुमारसंभवम् • अध्याय 5 • श्लोक 57
त्रिभागशेषासु निशासु च क्षणग्निमील्य नेत्रे सहसा व्यबुध्यत । क्क नीलकण्ठ व्रजसीत्यलक्ष्यवागसत्यकण्ठार्पितबाहुबन्धना ॥
रात के अंतिम भाग में थोड़ी देर आँखें बंद कर अचानक जाग उठती है और कहती है—हे नीलकण्ठ, कहाँ जा रहे हो—और फिर व्यर्थ ही बाहु फैलाती है।
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