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कुमारसंभवम् • अध्याय 5 • श्लोक 56
उपात्तवर्णे चरिते पिनाकिनः सबाष्पकण्ठस्खलितैः पदैरियम् । अनेकशः किन्नरराजकन्यका वनान्तसङ्गीतसखीररोदयत् ॥
शिव के गुणों का वर्णन करते हुए यह बार-बार आँसुओं से भरे कंठ से बोलती है और वन में किन्नर कन्याओं तथा सखियों को रुला देती है।
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