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कुमारसंभवम् • अध्याय 5 • श्लोक 50
कियच्चिरं श्राम्यसि गौरि विद्यते ममापि पूर्वाश्रमसञ्चितं तपः । तदर्धभागेन लभस्व काङ्कितं वरं तमिच्छामि च साधु वेदितुम् ॥
हे गौरी, तुम कब तक कष्ट सहोगी? मेरे पास भी पूर्व जन्म का संचित तप है; उसके आधे भाग से तुम अपने इच्छित वर को प्राप्त कर लो, और मैं भी उसे जानना चाहता हूँ।
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