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कुमारसंभवम् • अध्याय 5 • श्लोक 48
मुनिव्रतैस्त्वामतिमात्रकर्शितां दिवाकराप्ष्लष्टविभूषणास्पदाम् । शशाङ्कलेखामिव पश्यतो दिवा सचेतसः कस्य मनो न दूयते ॥
तुम्हें मुनिव्रतों से अत्यंत कृश और सूर्य से तप्त देखकर, जैसे दिन में चंद्रकला दिखाई दे, वैसे ही देखने वाले का मन व्याकुल हो उठता है।
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