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कुमारसंभवम् • अध्याय 5 • श्लोक 46
निवेदितं निश्वसितेन सोष्मणा मनस्तु मे संशयमेव गाहते । न दृश्यते प्रार्थयितव्य एव ते भविष्यति प्रार्थितदुर्लभः कथम् ॥
तुम्हारी उष्ण साँसों से कुछ संकेत मिलता है, फिर भी मेरा मन संदेह में है; जिसे माँगना चाहिए वह दिखाई नहीं देता, तो वह दुर्लभ वस्तु कैसे प्राप्त होगी?
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