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कुमारसंभवम् • अध्याय 5 • श्लोक 45
दिवं यदि प्रार्थयसे वृथा श्रमः पितुः प्रदेशास्तव देवभूमयः । अथोपयन्तारमलं समाधिना न रत्नमन्विष्यति मृग्यते हि तत् ॥
यदि तुम स्वर्ग की कामना करती हो तो यह व्यर्थ श्रम है, क्योंकि तुम्हारे पिता का प्रदेश ही देवभूमि है; और यदि पति चाहती हो, तो वह स्वयं तुम्हें खोजेगा, रत्न को ढूँढा नहीं जाता, वह स्वयं खोजा जाता है।
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