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कुमारसंभवम् • अध्याय 5 • श्लोक 44
किमित्यपास्याभरणानि यौवने धृतं त्वया वार्द्धकशोभि वल्कलम् । वद प्रदोषे स्फुटचन्द्रतारके विभावरी यद्यरुणाय कल्पते ॥
यौवन में आभूषण त्यागकर तुमने वृद्धावस्था के योग्य वल्कल क्यों धारण किया? बताओ, क्या संध्या के समय चंद्र और तारे प्रकट होने पर भी रात्रि अरुण होने का विचार करती है?
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