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कुमारसंभवम् • अध्याय 5 • श्लोक 42
भवत्यनिष्टादपि नाम दुःसहान्मनस्विनीनां प्रतिपत्तिरीदृशी । विचारमार्गप्रहितेन चेतसा न दृश्यते तच्च कृशोदरि त्वयि ॥
हे कृशोदरी, मनस्विनी स्त्रियों की ऐसी प्रवृत्ति अनिष्ट में भी सहन नहीं होती, परंतु विचारपूर्वक देखने पर यह तुममें दिखाई नहीं देती।
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