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कुमारसंभवम् • अध्याय 5 • श्लोक 4
मनीषिताः सन्ति गृहेऽपि देवतास्तपः क्व वत्से क च तावकं वपुः । पदं सहेत भ्रमरस्य पेलवं शिरीशपुष्पं न पुनः पतत्रिणः ॥
हे पुत्री, देवता घर में भी प्राप्त हो सकते हैं; तप कहाँ और तुम्हारा कोमल शरीर कहाँ? शिरीष का फूल तो भौंरे का भार सह सकता है, पर पक्षी का नहीं।
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