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कुमारसंभवम् • अध्याय 5 • श्लोक 38
अनेन धर्मः सविशेषमद्य मे त्रिवर्गसारः प्रतिभाति भाविनि । त्वया मनोनिर्विषयार्थकामया यदेक एव प्रतिगृह्य सेव्यते ॥
हे भविष्योन्मुखे, तुम्हारे द्वारा मन को विषयों से हटाकर केवल धर्म का पालन करने से मुझे आज धर्म ही त्रिवर्ग का सार प्रतीत होता है।
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