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कुमारसंभवम् • अध्याय 5 • श्लोक 30
अथाजिनाषाढधरः प्रगल्भवाग्ज्वलन्निव ब्रह्ममयेन तेजसा । विवेश कश्चिज्जटिलस्तपोवनं शरीरबद्धः प्रथमाश्रमो यथा ॥
तब मृगचर्म और दंड धारण किए, तेजस्वी वाणी वाले एक जटाधारी तपस्वी ब्रह्मतेज से प्रज्वलित होकर तपोवन में प्रवेश किया, मानो ब्रह्मचर्य आश्रम साकार हो उठा हो।
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