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कुमारसंभवम् • अध्याय 5 • श्लोक 29
मृणालिकापेलवमेवमादिभिर्वतैः स्वमङ्ग ग्लपयन्त्यहर्निशम् । तपः शरीरैः कठिनैरुपार्जितं तपस्विनां दूरमधश्चकार सा ॥
मृणाल की कोमलता के समान अपने शरीर को दिन-रात तप से क्षीण करती हुई उसने कठोर तप से प्राप्त होने वाले फल को भी पीछे छोड़ दिया।
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