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कुमारसंभवम् • अध्याय 5 • श्लोक 27
मुखेन सा पद्मसुगन्धिना निशि प्रवेपमानाधरपत्रशोभिना । तुषारवृष्टिक्षतपद्मसम्पर्दा सरोजसन्धानमिवाकरोदपाम् ॥
रात्रि में उसके कमल-सुगंधित मुख और काँपते अधरों से गिरती ओस की बूँदें ऐसे लगती थीं जैसे कमल के टूटे हुए दलों को जोड़ रही हों।
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