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कुमारसंभवम् • अध्याय 5 • श्लोक 26
निनाय सात्यन्तहिमोत्किरानिलाः सहस्यरात्रीरुदवासतत्परा । परस्पराक्रन्दिनि चक्रवाकयोः पुरो वियुक्ते मिथुने कृपावती ॥
वह अत्यंत ठंडी हवाओं में भी रात्रियाँ बिताती रही और चक्रवाक पक्षियों के वियोग से करुणा से भरकर उनके प्रति दयालु बनी रही।
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