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कुमारसंभवम् • अध्याय 5 • श्लोक 20
शुचौ चतुर्णा ज्वलतां हविर्भुजां शुचिस्मिता मध्यगता सुमध्यमा । विजित्य नेत्रप्रतिघातिनीं प्रभामनन्यदृष्टिः सवितारमैक्षत ॥
पवित्र अग्नियों के बीच खड़ी, शुद्ध मुस्कान वाली वह सुमध्यमा पार्वती, दृष्टि को चकाचौंध करने वाले तेज को जीतकर बिना पलक झपकाए सूर्य को देखने लगी।
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