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कुमारसंभवम् • अध्याय 5 • श्लोक 15
अरण्यबीजाञ्जलिदानलालितास्तथा च तस्यां हरिणा विशश्वसुः । यथा तदीयैर्नयनैः कुतूहलात्पुरः सखीनाममिमीत लोचने ॥
वन के बीजों को अंजलि में देकर पालन करने के कारण मृग भी उस पर वैसे ही विश्वास करने लगे जैसे पहले उसकी सखियों के सामने उसकी आँखों की चंचलता से करते थे।
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