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कुमारसंभवम् • अध्याय 5 • श्लोक 13
पुनर्ग्रहीतुं नियमस्थया तया द्वयेऽपि निक्षेप इवार्पितन्द्वयम् । लतासु तन्वीषु विलासचेष्टितं विलोलदृष्टं हरिणाङ्गनासु च ॥
नियम में स्थित होकर उसने अपने दोनों पूर्व व्यवहार मानो त्याग दिए—लताओं में अपनी क्रीड़ाएँ और मृगियों में चंचल दृष्टि डालना।
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