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कुमारसंभवम् • अध्याय 5 • श्लोक 12
महार्हशय्यापरिवर्तनच्युतैः स्वकेशपुष्पैरपि या स्म दूयते । अशेत सा बाहुलतोपधायिनी निषेदुषी स्थण्डिल एव केवले ॥
जो पहले शय्या पर करवट बदलने से गिरे केशपुष्पों से भी व्याकुल हो जाती थी, वही अब केवल भूमि पर हाथ को तकिया बनाकर सोने लगी।
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