तथा समक्ष दहता मनोभवं पिनाकिना भग्नमनोरथा सती । निनिन्द रूपं हृदयेन पार्वती प्रियेषु सौभाग्यफला हि चारुता ॥
शिव द्वारा सामने ही कामदेव को भस्म होते देख, अपनी इच्छा भंग होने पर पार्वती ने मन ही मन अपने रूप को दोष दिया, क्योंकि प्रिय के लिए सौन्दर्य तभी सार्थक होता है जब वह प्रिय को प्राप्त कराए।
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