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कुमारसंभवम् • अध्याय 4 • श्लोक 46
अथ मदनवधूरुपप्लवान्तं व्यसनकृशा परिपालयां बभूव । शशिन इव दिवातनस्य लेखा किरणपरिक्षयधूसरा प्रदोषम् ॥
तब कामदेव की पत्नी रति दुःख से क्षीण होकर विपत्ति के अंत तक अपने जीवन को संभालती रही, जैसे दिन में क्षीण हुई चंद्रकला संध्या तक धूमिल बनी रहती है।
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