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कुमारसंभवम् • अध्याय 4 • श्लोक 34
अमुनैव कषायितस्तनी सुभगेन प्रियगात्रभस्मना । नवपल्लवसंस्तरे यथा रचयिष्यामि तनुं विभावसौ ॥
मैं अपने प्रिय के शरीर की भस्म से रंजित वक्ष के साथ, अग्नि में नए पत्तों की शैया पर अपने शरीर को अर्पित करूँगी।
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