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कुमारसंभवम् • अध्याय 4 • श्लोक 32
तदिदं क्रियतामनन्तरं भवता बन्धुजनप्रयोजनम् । विधुरां ज्वलनातिसर्जनान्ननु मां प्रापय पत्युरन्तिकम् ॥
अब आप मेरे प्रति यह कर्तव्य करें कि मुझे इस दुःख से मुक्त कर अग्नि में समर्पित कर मेरे पति के पास पहुँचा दें।
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