गत एव न ते निवर्तते स सखा दीप इवानिलाहतः । अहमस्य दशेव पश्य मामविषह्यव्यसनप्रधूषिताम् ॥
तुम्हारा वह मित्र वसंत अब लौटकर नहीं आएगा, जैसे वायु से बुझा दीपक नहीं लौटता; और मुझे देखो, मैं उसकी दशा के समान असह्य दुःख से ग्रस्त हूँ।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
कुमारसंभवम् के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।
सभी अध्याय उपलब्ध
कुमारसंभवम् के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।