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कुमारसंभवम् • अध्याय 4 • श्लोक 25
अथ तैः परिदेविताक्षरैहृदये दिग्धशरैरिवार्दितः । रतिमभ्युपपत्तुमातुरां मधुरात्मानमदर्शयत्पुरः ॥
उसके विलाप भरे वचनों से आहत होकर, मानो हृदय में बाण लगे हों, कामदेव ने व्याकुल रति के सामने अपने मधुर स्वरूप को प्रकट किया।
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