क नु ते हृदयङ्गमः सखा कुसुमायोजितकार्मुको मधुः । न खलुग्ररुषा पिनाकिना गमितः सोऽपि सुहृद्गतां गतिम् ॥
तुम्हारा प्रिय मित्र वसंत, जो पुष्पधनुष धारण करता था, क्या वह भी शिव के क्रोध से नष्ट होकर तुम्हारी ही तरह नहीं चला गया?
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