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कुमारसंभवम् • अध्याय 4 • श्लोक 2
अवधानपरे चकार सा प्रलयान्तोन्मिषिते विलोचने । न विवेद तयोरतृप्तयोः प्रियमत्यन्तविलुप्तदर्शनम् ॥
उसने ध्यानपूर्वक अपनी आँखें खोलीं, परंतु अपने प्रिय के दर्शन के पूर्णतः लुप्त हो जाने को समझ नहीं सकी।
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