शिरसा प्रणिपत्य याचितान्युपगूढानि सवेपनि च । सुरतानि च तानि ते रहः स्मर संस्मृत्य न शान्तिरस्ति मे ॥
हे स्मर, तुम्हारे वे प्रेमालिंगन, विनती और रहस्यपूर्ण मिलन, जिन्हें मैंने सिर झुकाकर प्राप्त किया था, उन्हें स्मरण कर मुझे शांति नहीं मिलती।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
कुमारसंभवम् के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।
सभी अध्याय उपलब्ध
कुमारसंभवम् के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।