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कुमारसंभवम् • अध्याय 4 • श्लोक 11
रजनीतिमिरावगुण्ठिते पुरमार्गे घनशब्दविक्लवाः । वसतिं प्रिय कामिनां प्रियास्त्वदृते प्रापयितुं क ईश्वरः ॥
रात्रि के अंधकार से ढके नगरमार्ग में बादलों के गर्जन से विचलित प्रिय स्त्रियों को उनके प्रिय के पास पहुँचाने में अब तुम्हारे बिना कौन समर्थ है?
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