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कुमारसंभवम् • अध्याय 3 • श्लोक 76
सपदि मुकुलिताक्षीं रुद्रसंरम्भभीत्या दुहितरमनुकम्प्यामद्रिरादाय दोर्थ्याम् । सुरगज इव विभ्रत्पद्मिनीं दन्तलग्नां प्रतिपथगतिरासीद्वेगदीर्घाकृताङ्गः ॥
रुद्र के क्रोध से भयभीत अपनी आँखें बंद किए हुई पुत्री को करुणा से उठाकर पर्वतराज उसे ऐसे ले चले जैसे देवगज अपने दाँतों में कमलिनी को लेकर शीघ्र गति से चलता है।
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