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कुमारसंभवम् • अध्याय 3 • श्लोक 68
विवृण्वती शैलसुतापि भावमङ्गः स्फुरद्वालकदम्बकल्पैः । साचीकृता चारुतरेण तस्थी मुखेन पर्यस्तविलोचनेन ॥
शैलसुता ने भी अपने शरीर के भावों को प्रकट करते हुए, सुंदर मुख से एक ओर दृष्टि डालकर लज्जित भाव से खड़ी रही।
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