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कुमारसंभवम् • अध्याय 3 • श्लोक 62
उमापि नीलालकमध्यशोभि विस्त्रंसयन्ती नवकर्णिकारम् । चकार कर्णच्युतपल्लवेन मूर्धा प्रणामं वृषभध्वजाय ॥
उमा ने भी अपने नीले केशों के बीच शोभित नए कर्णिकार पुष्प को ढीला करते हुए, कान से गिरे पल्लव के साथ वृषभध्वज शिव को मस्तक झुकाकर प्रणाम किया।
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