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कुमारसंभवम् • अध्याय 3 • श्लोक 61
तस्याः सखीभ्यां प्रणिपातपूर्वं स्वहस्तलूनः शिशिरात्ययस्य । व्यकीर्यत त्र्यम्बकपादमूले पुष्पोच्चयः पल्लवभङ्गभिन्नः ॥
उसकी सखियों ने प्रणाम करके शिशिर ऋतु के अंत में स्वयं तोड़े गए पुष्पों का गुच्छा, पत्तों के टूटने से बिखरा हुआ, त्र्यम्बक के चरणों में अर्पित किया।
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