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कुमारसंभवम् • अध्याय 3 • श्लोक 55
स्रस्तां नितम्बादद्दलम्बमाना पुनः पुनः केसरदामकाञ्चीम् । न्यासीकृतां स्थानविदा स्मरेण मौर्वी द्वितीयामिव कार्मुकस्य ॥
उसकी केसरमालाओं की करधनी बार-बार नितंब से ढीली होकर गिरती और वह उसे ठीक करती, मानो कामदेव ने उसे धनुष की दूसरी डोरी के समान स्थापित किया हो।
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