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कुमारसंभवम् • अध्याय 3 • श्लोक 52
निर्वाणभूयिष्ठमथास्य वीर्य सन्धुक्षयन्तीव वपुर्गुणेन । अनुप्रयाता वनदेवताभ्यामदृश्यत स्थावरराजकन्या ॥
तब उसके शांत स्वरूप को अपने गुणों से उद्दीप्त करती हुई, वनदेवियों के साथ पर्वतराज की कन्या प्रकट हुई।
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