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कुमारसंभवम् • अध्याय 3 • श्लोक 49
कपालनेत्रान्तरलब्धमार्गेज्र्योतिः प्ररोहैरुदितैः शिरस्तः । मृणालसूत्राधिकसौकुमार्या बालस्य लक्ष्मी ग्लपयन्तमिन्दोः ॥
उनके मस्तक पर तीसरे नेत्र से निकली ज्योति ऐसे प्रकट हो रही थी कि वह चंद्रमा की कोमलता को भी फीका कर रही थी।
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