श्रुताप्सरोगीतिरपि क्षणेऽस्मिन्हरः प्रसङ्ख्यानपरो बभूव । आत्मेश्वराणां न हि जातु विघ्नाः समाधिभेदप्रभवो भवन्ति ॥
इस समय अप्सराओं के गीत सुनकर भी शिव अपने ध्यान में लीन रहे, क्योंकि आत्मसंयमी पुरुषों के लिए विघ्न कभी भी समाधि को भंग नहीं कर पाते।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
कुमारसंभवम् के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।
सभी अध्याय उपलब्ध
कुमारसंभवम् के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।